शुक्रवार, 12 मार्च 2021

कविता की अमराई : भाग - 3

20. ये झगड़ालू कविताएँ

होती हैं कविताएँ
किसिम-किसिम की

कुछ अनुसन्धान की
कुछ समाधान की
कुछ अनुदान की

कुछ जनवादी
कुछ मनवादी (मनुवादी)
कुछ तनवादी
कुछ धनवादी
आदि-आदि

और झोंटा-झोंटी करती रहती हैं वे

समूह बनाकर
आपस में
एक दूसरे से

झगड़ालू स्त्रियों की तरह।


21. प्रतिक्रियावादी

होता है
बहुत कुछ
क्रिया-प्रतिक्रिया से
यहाँ तक कि
हो जाते हैं पैदा
बच्चे भी
और हो जाते हैं वे
प्रतिक्रियावादी
अपने माँ-बाप के ही विरूद्ध।


22. कुण्डलियाँ और कुण्डली

कुण्डलियाँ लिखते-लिखते
वे थक गये, पक गये
और
काव्य-गोष्ठियों / सम्मेलनों की
अध्यक्षता तथा संचालन में
तन-मन-धन से लग गये।
यूँ साहित्य-कोष पर
कुण्डली मार कर बैठ गये।
20.11.1995


23. वन्दना (बाल गीत)

माँ सरस्वती! यह तू वर दे।

हम अबोध बच्चों के मानस-
पट को तू अति उज्ज्वल कर दे।

ज्ञान सूर्य की किरणें जिससे
नव आभा बिखरायें,
ज्ञान-पुंज से हों आलोकित
हम ज्ञानी बन जायें।

माँ सरस्वती! निज वीणा से
शान्ति-लहरियाँ भर दे।
माँ सरस्वती! यह तू वर दे।

हम बच्चे हैं भटक रहे
घने अन्धकार में
मरे जा रहे मँहगी के
विकट इस मार से
देकर सूर्यलोक माँ हमें
तू भास्वरं कर दे।
26.09.2010


24. सर्दी की पाती बसन्त के नाम

पौष माह में ठिठुरी सर्दी
ऋतु वसन्त को लिखती पाती,
मैं जो तेरी बड़ी बहन हूँ
हाथ जोड़कर तुझे बुलाती !

मैं गरीब हूँ, अर्द्धनग्न हूँ
पास नहीं कुछ खास है मेरे
हाथ कँप रहे, दाँत बज रहे,
पाँव धरा पर टिकें न मेरे।

मात्र एक साड़ी तन पर जो
हरी-भरी, पर कटी-फटी है
कहीं-कहीं है शुष्क, पर अधिक
गीली ही तन पर लिपटी है।

झरे काँस फूलों के बूटे
साड़ी की शोभा न बढ़ाते
कीट ढूँढ़ते वक-समूह हैं
उस पर अंकित मन को भाते।

तेरी दीन-दुखी यह भगिनी
सरसों के कुछ हार चढ़ाती
मैं अपने रीते हाथों से
तुझे हृदय का प्यार चढ़ाती।

थोड़ी-सी  ही  मेरी  पूँजी
किंचित् फूलों में जो बिखरी,
गुलदाउदी, गुलाब, गेंदों के
भव्य रूप में जो है निखरी,

उनकी मनका गूँथ-गूँथ कर
तुझको हूँ उपहार भेजती
ईश्वर तुझको सुखी बनाये,
नये वर्ष के हाथ भेजती।

तू भी अपनी विपुल सम्पदा
घरती माँ को अर्पित करना,
दुःखी जनों के अश्रु पोंछकर
प्यारी माँ के सब दुःख हरना।


25. मसूरी: एक परिदृश्य

कारें सरक रहीं सड़कों पर
चाभी-भरे खिलौनों-सी।

‘केमल  बैक रोड’ से  मैंने
ऊपर से नीचे देखा
जादू-सा चल गया हृदय पर
खिंच गई विस्मय की रेखा
नीचे कारें भाग रही थीं
चाभी-भरे खिलौनों-सी।

‘गन हिल’ के सर्वोच्च शिखर पर
रज्जुमार्ग से हम पहुँचे,
धुर उत्तर हिमशिखरों पर फिर
दृष्टि-पथों से हम पहुँचे
हिमनदियों के रजत-स्रोत में
दृष्टि नहायी छौनों-सी।

हरियाली-निर्झर के जल में
मानो प्रकृति नहायी हो
या मुग्धा ने स्वप्न-पाश में
बँधकर ली अँगड़ाई हो
अपनी अपलक दृष्टि प्रकृति पर
बिछ गई स्निग्ध बिछौनों-सी।

किंचित् कुसुमों से आभूषित
कुदरत इठलाती फिरती,
यात्रि दलों की दृष्टि फिसलती
उसके यौवन पर तिरती
मस्तक पर ‘गनहिल’ चट्टानें
शोभित हुई डिठौनों-सी।

शीतल, मन्द समीरण बहता
लेकर सौरभ का मधु भार
खगकुल अपने कल कूँजन से
करते प्रकृति का श्रृंगार
धूप गुनगुनी भरे चौकड़ी
चंचल-से मृगछौनों-सी।

तरण-ताल पर थिरक रही थीं
रंग-बिरंगी नौकाएँ,
हँसी-फुहारे छूट रहे थे,
चहक रही थीं बालाएँ
चिड़ियों की वो मीठी तानें
हो गयी छोटी बौनों-सी।


27. हर की पैड़ी

‘हर की पैड़ी’ हरिद्वार का
है शोभा-आगार।

अनुपम सुषमा है अलका सी
यह है भू की पावन काशी
प्रकृति विहँसती यहाँ रात-दिन
नहीं गन्दगी यहाँ जरा सी
कलकल-छलछल बहती गंगा,
श्यामल-शीतल धार।

चारों ओर दिखे हरियाली
और पहाड़ी छटा निराली
यहाँ प्रदूषण-रहित धरा पर
फैली रहती है खुशहाली
रोज़ शाम को पहने धारा
जगमग दीपक-हार।

चाय-पान की यहाँ दुकानें
ऊँची के फीके पकवानें
मालिक इनके सोचें बैठे
लोग यहाँ आते लुटवाने
यात्री की जेबों के कर्तन
का इनका व्यापार।

आस्थाओं के दीप जलाये
दूर-दूर से यात्री आये
इस पावन हरि के स्थल पर
भक्ति-भाव से शीश झुकाये
माँ सुरसरि! अपने भक्तों का
वन्दन हो स्वीकार।


28. माँ! कैसे तव गाथा गाऊँ ?

माँ! कैसे तव गाथा गाऊँ ?
शस्य श्यामला तेरा तन है
सुरसरि-सा पावन तव मन है
तेरे चरणों में नत होकर
किन सुमनों की भेंट चढ़ाऊँ ?

सुर तेरी गोदी को तरसें
मुनि ज्ञानी अमृत जल बरसे
तुम वसु का अक्षय आलय हो
तुमको क्या उपहार चढ़ाऊँ ?

षट् ऋतुओं के चक्र चलाती
मनमोहक लीला दिखलाती
विश्व-शान्ति की दूती। तेरी
कैसे मैं आरती सजाऊँ ?

गंगा-यमुना मनका धारे
महार्णव तव चरण पखारे
हिम-किरीट-मण्डित भारत माँ!
कैसे तेरी सुषमा गाऊँ ?

तुम जननी घनश्याम-राम की
महावीर, गान्धी महान् की
अवतारों की प्रसव भूमि हो!
किन छन्दों में महिमा गाऊँ ?

वीर शिवा, राणा अभिमानी
कोटि-कोटि जन्में बलिदानी
वीर-प्रसू भारत माता हे!
तुम्हें प्रेम से शीश झुकाऊँ।

कविता की अमराई : भाग - 2

15. अहं का दैत्य

आज अहम् का दैत्य
हमारे दरवाजे पर सींग मारता,
युग-युग से सँवरे आँगन में
मल-मूत्रों का कीच झारता।

दूर भगाकर इस दानव को
सुख का स्वप्न सजा सकते हो,
एवं संस्कृति के विकास में
आगे कदम बढ़ा सकते हो।।
30.08.1976


16. सेवा-निवृत्ति

पहले बन्धन, अब विहार है।

एक छटपटाहट पिंजरे की
इक आहट भविष्य खतरे की
संघर्षों से इन्हें जोड़ता

मेरा यह मन निर्विकार है।

कई आँधियाँ आकर गुजरीं
जन्म-मृत्यु से राहें गुजरीं
सकल जगत् ही है कुटुम्ब-सा

मन! चिन्ता का क्यों शिकार है ?

अब न समय का बन्धन सहना
मुक्त हवा-पानी-सा बहना
जीवन-सरिता के प्रवाह में

सुख-दुःख का अब नहीं भार है।
पहले बन्धन, अब विहार है।।


17. हाइकू-गीत

बच्चे का मुँह
एक प्रयोगशाला
वस्तु-ज्ञान की।

मिट्टी का चूरा
या जो भी लगे हाथ
मुँह में डाले।

चींटी या चींटा
जो पकड़ में आये
मुँह-हवाले।

बच्चे की जिह्वा
एक साधना स्थली
तथ्य-ज्ञान की। बच्चे का मुँह.......

माँ को जो देखे
तो किलकारियों से
स्वागत करे।

गूँगे के गुड़-सा
भावों का निर्झर
नयनों झरे।

वाह! क्या बच्चा
है, मन का सच्चा वो
वस्तु-ध्यान की। बच्चे का मुँह......
(‘मरु-गुलशन’07.09.1999)


18. औ’ पुलिस सोयी हुई

शहर में तो मचा कत्लेआम
औ’ पुलिस सोयी हुई।
उन पे देखो खून का इल्ज़ाम
औ’ पुलिस सोई हुई।

घूमते यमदूत आठो याम,
पुलिस है सोयी हुई
या कि कैसा घूस का यह काम
कि पुलिस है सोयी हुई।


19. धूप (मुक्तक)

इन ठिठुरती सर्दियों में
हम जरा-सी धूप ले लें,
कालिमा के इन दिनों में
हम कुमुद का रूप ले लें।

धूप तो गायब हुई है
गदर्भों की सींग जैसी,
शीत से जग को बचाने
सूर्य का हम रूप ले लें।

माघ-पूस के घोर शीत में
बड़ी सुहावन लगती धूप,
अंग-अंग जब जकड़ गया तो
अकड़ छुड़ाने लगती धूप।

बड़े सवेरे झुण्ड बाँध कर
टेलीफोन के तारों पर,
कौओं की पंचायत बैठी
कड़क ठण्ड में लेने धूप।



बुधवार, 10 मार्च 2021

कविता की अमराई : भाग - 1

1. शिव-स्तुति (मंगलाचरण)

हे आदिदेव तुमको प्रणाम !
तुम नवल सृष्टि के बीजरूप
तुम मानवता के नये साज
तुम ‘अष्टप्रकृति’ के मूर्त रूप
तुमसे अनुप्राणित है समाज
देवाधिदेव, तुमको प्रणाम !

छल-छद्मों से परिपूर्ण विश्व
व्याकुल, पीड़ित मानव-समाज
फिर अपने ताण्डव नर्तन से
उन्मूल करो पाखण्ड-राज
दिखला अपने चिनमय विराट
हे महादेव, तुमको प्रणाम।

रचनातिथि : 16.02.1988 महाशिवरात्रि
स्थान : मुजफ्फरनगर(उ०प्र०)

2. वाणी-वन्दना (माँ सरस्वती)

माँ सरस्वती ! यह तू वर दे।
सान्द्र तमिस्रा करे पलायन
वेद-मंत्र का निशिदिन गायन
व्यथित विश्व के मानस में भर
तु मानव को उज्जवल कर दे।

लोभ-मोह की आयी आँधी
मानव बना महा अपराधी
उसके कर में माँ सरस्वती
ज्ञानपुंज की दीपक धर दे

झंकृत कर दे वीणा का स्वर
जिससे मूक बने झिल्ले-रव
अपने वर दे जनमानस में
शान्ति-भाव का कोना भर दे।

सुरभि बिखेरो श्वेत कमल की
और कान्ति कलहंस धवल की
कुन्द-इन्दु सी कान्तिमयी माँ
जग का कलुष दूर तू कर दे।

कंटक बिछे मार्ग में मेरे
विपदाओं ने डाले घेरे
उन्हें दृष्टि से दूर हटा माँ
मेरा पथ प्रशस्ततर कर दे
माँ सरस्वती ! यह तू वर दे।


3. ‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार....

पवस-प्रणय गीत (नवगीत) वियोग श्रृंगार का गीत

‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार
फिर भी तुम न आये।
घिर गयीं पावस-घटाएँ
तुम भटकते यक्ष-सा क्यों ?
मार्ग अलका भूल बैठे
कालिदासीय मतिभ्रम क्यों ?
प्यार की पाती कपोतों से पठाये
फिर भी तुम न आये।
‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार

जल रही है देह सारी
प्यास से जलता गला है
स्वाति-बूंदों के लिए अब
हो गया मन बावला है,
घन घटा में मोर का नर्तन
मेरे मन को रूलाये
‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार
फिर भी तुम न आये।


4. सन्नाटा तोड़ती घड़ी

अच्छा लगता तोड़ सन्नाटा
मेज घड़ी का टिक्-टिक् करना।

तड़के की शाश्वत चुप्पी को
क्योंकर तोड़ रही हो प्रियवर!
लेकर उर में एक गहन तम
धरा सो रही आँख मूँदकर

क्यों तुमको प्रिय ही लगता है
सन्नाटे से चिक्-चिक् करना।

समय उड़ रहा पंख लगाकर
तेरी टिक्-टिक् बता रही है
अपने कार्य शीघ्र निपटा लो
बार-बार यह जता रही है

पर सबकी आदत है, प्रियवर!
‘बुरा समय’ कह झिक-झिक करना।।


5. जब बरसे घन घेरि बदरिया
                      विरह गीत (गायन हेतु)

जब बरसे घन घेरि बदरिया
भीजे तन, मन और चुनरिया
तब प्रीतम की सुधि तड़पाये।

चमके जब यह सवत बिजुलियाँ
तब मन में बस जाय सँवलिया
रात सवत तब काटन धाये।

पिउ मोरा परदेश बसत है
सावन बनकर साँप डसत है
घन! क्यों सुधि के बान चलाये?
27.07.1975


6. दोहे : चिकित्सकों की हड़ताल

प्राइवेट नर्सिंगहोम में सरकारी निषेध आदेश के विरूद्ध चिकित्सकों की हड़ताल

चिकित्सक हड़ताल पर
रहे मरीज बेहाल
भीड़ बढ़ गयी कई गुनी
सरकारी अस्पताल
बस हड़ताल विरोध में
खड़े विद्यालय-छात्र
आम आदमी भी नहीं
गूँगे दर्शक मात्र।

सरकारी अस्पताल अब
हैं, हाथी के दाँत,
दिखलाते कुछ और हैं
किन्तु और ही बात।

मँहगी के इस दौर में, ओ पीड़ित-जन लोग!
ले लो हाथ लुकाठियाँ, करो सभी सहयोग।

बढ़ो ‘सदन’ की ओर तब, यूँ चेते सरकार,
नहीं तो पड़ती जायगी, मँहगाई की मार।

पत्रकारिता हो गयी चमचों की सरताज,
सरकारी मुँह देखकर, करे स्तवन आज।।


7. आज क्यों मन है बहक रहा ?

घटा घिर रही काली-काली
मन को चंचल करने वाली
सावन के मधुमय अंचल में
मन क्यों दहक रहा ?

श्याम घटा में पर फैलाये
खगकुल कलकल गान सुनाये
मत्त मयूरों के नर्तन से
मन क्यों विमुख रहा ?

रिमझिम-रिमझिम गिरती बूँदें
तड़ित-ज्योति नयनों को मूँदे
विद्युत के गर्जन-सँग ही
यह मन
क्यों तड़प रहा ?

पुरवैया ने जोर दिखाया
तरु-गुल्मों के दिल दहलाया
जुगनू-तारक नाचें जब
मन क्यों सहम रहा ?

प्रियतम बिन यह कुटिया सूनी
निबिड़ निशा है दाहक दूनी
जब जुगनू झिलमिल चमकें
तब मन क्यों झुलस रहा ?
03.08.1975


8. नरसिंह

सुनते हैं
किया था विनाश
नरसिंह रूप में अवतार लेकर
भगवान ने
किसी हिरण्यकशिपु राक्षस का
किसी मासूम को बचाने के लिए।

पर युग की बलिहारी
कि अब
नर्सिंग होम के नरसिंह
करने लगे हैं
वध
अनेक मासूमों का
जान बचाने के बहाने।

यही नहीं
बल्कि अब तो
नरसिंह डाक्टर (जिन्हें पहले,
ईश्वर के बाद दूसरे भगवान
के रूप में सम्मान प्राप्त था)


9. कीर्तन

उनके घर
लाउड स्पीकर पर
कीर्तन की धुन
सुन
किसी ने फब्ती कसीरू
‘‘इनके घर लक्ष्मी जी
आती हैं बैक डोर से
कीर्तन तो
उनके स्वच्छन्द विचरण के लिए
फ्रन्ट डोर है।’’


10. सूरज की फांक
 

आज फिर
निकला है
सूरज एक लाल।

चीथड़ा एक फँस गया
मध्य में
श्यामल बादल का
और हो गया दो टुकड़ा,
जैसे टूटी हो
साबुत मसूर की दाल।।

प्रकाशितरू स्वदेश चर्चा (बिजनौर) साप्ताहिक 1997



11. उद्धत तोते

ढ़ली शाम को
उद्धत तोते शोर मचाते हैं
अतिथि आगतों के
स्वागत में ढ़ोल बजाते हैं
उनके सिर पर
मँडरा-मँडरा क्या कुछ गाते हैं
मतलब जिसका
अभ्यागत भी पकड़ न पाते हैं
लगता ये भारत संसद के
कभी रहे मेम्बर
जैसे घेरें क्रोधित होकर
अध्यक्षी चौम्बर।


12. बोली बदलो, बानी बदलो.....

बोली बदलो, बानी बदलो
दाल, भात औ’ पानी बदलो।
यदि जमाना बदला ही है
तब सब कुछ आसानी बदलो।

समय-संग यदि तुम ना बदले
तुम सभी(समय) से कट जाओगे
मर जाओगे, सड़ जाओगे।
इसीलिए तुम भी कुछ बदलो
धर्म, समाज लासानी बदलो।।
01.0.2000



13. रामकोला और नेता

पंचों!   रामकोला   में   लगा   एक   मेला,
पक  रहा  जहाँ  राजनीतिक  पूड़ी व छोला।
लूटने   को   लपके   वे   दल   के   दल
चाहे  पायें  हिस्सा  बड़ा,  छोटा या मझोला।
सभी   राजनेता   ले   दौड़े  अपना  झोला।

ऐसी  आपाधापी   में   मचा   यह    झमेला,
पाने   को   प्रसाद   कैसा  मचा  है बवेला।
बदल   रहे   नेतागण  क्षण-क्षण  में  चोला,
पहुँच  रामकोला  गढ़ते  मन  का  बमगोला।


14. वन पर संकट के बादल

यदि वन में गूँजे स्यारों के स्वर क्रन्दन के
क्या अन्तर पड़ सका सेहत पर भी वन के।

पर यदि सिंह दहाड़ छोड़ क्रन्दन पर उतरे,
निश्चय ही वन पर संकट के बादल घहरें।

तभी वन्य जीवों के मन में उठती शंका,
कि वन छोड़े शीघ्र या गहें पथ गहवर का।।
29.09.1994
(‘जवाहर नर्सिंग होम’ लूकरगंज इलाहाबाद में
पत्नी के इलाज के दौरान लिखित गीत - ज०प्र० ‘सात्विक’)