1. शिव-स्तुति (मंगलाचरण)
हे आदिदेव तुमको प्रणाम !
तुम नवल सृष्टि के बीजरूप
तुम मानवता के नये साज
तुम ‘अष्टप्रकृति’ के मूर्त रूप
तुमसे अनुप्राणित है समाज
देवाधिदेव, तुमको प्रणाम !
छल-छद्मों से परिपूर्ण विश्व
व्याकुल, पीड़ित मानव-समाज
फिर अपने ताण्डव नर्तन से
उन्मूल करो पाखण्ड-राज
दिखला अपने चिनमय विराट
हे महादेव, तुमको प्रणाम।
रचनातिथि : 16.02.1988 महाशिवरात्रि
स्थान : मुजफ्फरनगर(उ०प्र०)
2. वाणी-वन्दना (माँ सरस्वती)
माँ सरस्वती ! यह तू वर दे।
सान्द्र तमिस्रा करे पलायन
वेद-मंत्र का निशिदिन गायन
व्यथित विश्व के मानस में भर
तु मानव को उज्जवल कर दे।
लोभ-मोह की आयी आँधी
मानव बना महा अपराधी
उसके कर में माँ सरस्वती
ज्ञानपुंज की दीपक धर दे
झंकृत कर दे वीणा का स्वर
जिससे मूक बने झिल्ले-रव
अपने वर दे जनमानस में
शान्ति-भाव का कोना भर दे।
सुरभि बिखेरो श्वेत कमल की
और कान्ति कलहंस धवल की
कुन्द-इन्दु सी कान्तिमयी माँ
जग का कलुष दूर तू कर दे।
कंटक बिछे मार्ग में मेरे
विपदाओं ने डाले घेरे
उन्हें दृष्टि से दूर हटा माँ
मेरा पथ प्रशस्ततर कर दे
माँ सरस्वती ! यह तू वर दे।
3. ‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार....
पवस-प्रणय गीत (नवगीत) वियोग श्रृंगार का गीत
‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार
फिर भी तुम न आये।
घिर गयीं पावस-घटाएँ
तुम भटकते यक्ष-सा क्यों ?
मार्ग अलका भूल बैठे
कालिदासीय मतिभ्रम क्यों ?
प्यार की पाती कपोतों से पठाये
फिर भी तुम न आये।
‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार
जल रही है देह सारी
प्यास से जलता गला है
स्वाति-बूंदों के लिए अब
हो गया मन बावला है,
घन घटा में मोर का नर्तन
मेरे मन को रूलाये
‘स्वागतम्’ लिखकर सजाये द्वार
फिर भी तुम न आये।
4. सन्नाटा तोड़ती घड़ी
अच्छा लगता तोड़ सन्नाटा
मेज घड़ी का टिक्-टिक् करना।
तड़के की शाश्वत चुप्पी को
क्योंकर तोड़ रही हो प्रियवर!
लेकर उर में एक गहन तम
धरा सो रही आँख मूँदकर
क्यों तुमको प्रिय ही लगता है
सन्नाटे से चिक्-चिक् करना।
समय उड़ रहा पंख लगाकर
तेरी टिक्-टिक् बता रही है
अपने कार्य शीघ्र निपटा लो
बार-बार यह जता रही है
पर सबकी आदत है, प्रियवर!
‘बुरा समय’ कह झिक-झिक करना।।
5. जब बरसे घन घेरि बदरिया
विरह गीत (गायन हेतु)
जब बरसे घन घेरि बदरिया
भीजे तन, मन और चुनरिया
तब प्रीतम की सुधि तड़पाये।
चमके जब यह सवत बिजुलियाँ
तब मन में बस जाय सँवलिया
रात सवत तब काटन धाये।
पिउ मोरा परदेश बसत है
सावन बनकर साँप डसत है
घन! क्यों सुधि के बान चलाये?
27.07.1975
6. दोहे : चिकित्सकों की हड़ताल
प्राइवेट नर्सिंगहोम में सरकारी निषेध आदेश के विरूद्ध चिकित्सकों की हड़ताल
चिकित्सक हड़ताल पर
रहे मरीज बेहाल
भीड़ बढ़ गयी कई गुनी
सरकारी अस्पताल
बस हड़ताल विरोध में
खड़े विद्यालय-छात्र
आम आदमी भी नहीं
गूँगे दर्शक मात्र।
सरकारी अस्पताल अब
हैं, हाथी के दाँत,
दिखलाते कुछ और हैं
किन्तु और ही बात।
मँहगी के इस दौर में, ओ पीड़ित-जन लोग!
ले लो हाथ लुकाठियाँ, करो सभी सहयोग।
बढ़ो ‘सदन’ की ओर तब, यूँ चेते सरकार,
नहीं तो पड़ती जायगी, मँहगाई की मार।
पत्रकारिता हो गयी चमचों की सरताज,
सरकारी मुँह देखकर, करे स्तवन आज।।
7. आज क्यों मन है बहक रहा ?
घटा घिर रही काली-काली
मन को चंचल करने वाली
सावन के मधुमय अंचल में
मन क्यों दहक रहा ?
श्याम घटा में पर फैलाये
खगकुल कलकल गान सुनाये
मत्त मयूरों के नर्तन से
मन क्यों विमुख रहा ?
रिमझिम-रिमझिम गिरती बूँदें
तड़ित-ज्योति नयनों को मूँदे
विद्युत के गर्जन-सँग ही
यह मन क्यों तड़प रहा ?
पुरवैया ने जोर दिखाया
तरु-गुल्मों के दिल दहलाया
जुगनू-तारक नाचें जब
मन क्यों सहम रहा ?
प्रियतम बिन यह कुटिया सूनी
निबिड़ निशा है दाहक दूनी
जब जुगनू झिलमिल चमकें
तब मन क्यों झुलस रहा ?
03.08.1975
8. नरसिंह
सुनते हैं
किया था विनाश
नरसिंह रूप में अवतार लेकर
भगवान ने
किसी हिरण्यकशिपु राक्षस का
किसी मासूम को बचाने के लिए।
पर युग की बलिहारी
कि अब
नर्सिंग होम के नरसिंह
करने लगे हैं
वध
अनेक मासूमों का
जान बचाने के बहाने।
यही नहीं
बल्कि अब तो
नरसिंह डाक्टर (जिन्हें पहले,
ईश्वर के बाद दूसरे भगवान
के रूप में सम्मान प्राप्त था)
9. कीर्तन
उनके घर
लाउड स्पीकर पर
कीर्तन की धुन
सुन
किसी ने फब्ती कसीरू
‘‘इनके घर लक्ष्मी जी
आती हैं बैक डोर से
कीर्तन तो
उनके स्वच्छन्द विचरण के लिए
फ्रन्ट डोर है।’’
10. सूरज की फांक
आज फिर
निकला है
सूरज एक लाल।
चीथड़ा एक फँस गया
मध्य में
श्यामल बादल का
और हो गया दो टुकड़ा,
जैसे टूटी हो
साबुत मसूर की दाल।।
प्रकाशितरू स्वदेश चर्चा (बिजनौर) साप्ताहिक 1997
11. उद्धत तोते
ढ़ली शाम को
उद्धत तोते शोर मचाते हैं
अतिथि आगतों के
स्वागत में ढ़ोल बजाते हैं
उनके सिर पर
मँडरा-मँडरा क्या कुछ गाते हैं
मतलब जिसका
अभ्यागत भी पकड़ न पाते हैं
लगता ये भारत संसद के
कभी रहे मेम्बर
जैसे घेरें क्रोधित होकर
अध्यक्षी चौम्बर।
12. बोली बदलो, बानी बदलो.....
बोली बदलो, बानी बदलो
दाल, भात औ’ पानी बदलो।
यदि जमाना बदला ही है
तब सब कुछ आसानी बदलो।
समय-संग यदि तुम ना बदले
तुम सभी(समय) से कट जाओगे
मर जाओगे, सड़ जाओगे।
इसीलिए तुम भी कुछ बदलो
धर्म, समाज लासानी बदलो।।
01.0.2000
13. रामकोला और नेता
पंचों! रामकोला में लगा एक मेला,
पक रहा जहाँ राजनीतिक पूड़ी व छोला।
लूटने को लपके वे दल के दल
चाहे पायें हिस्सा बड़ा, छोटा या मझोला।
सभी राजनेता ले दौड़े अपना झोला।
ऐसी आपाधापी में मचा यह झमेला,
पाने को प्रसाद कैसा मचा है बवेला।
बदल रहे नेतागण क्षण-क्षण में चोला,
पहुँच रामकोला गढ़ते मन का बमगोला।
14. वन पर संकट के बादल
यदि वन में गूँजे स्यारों के स्वर क्रन्दन के
क्या अन्तर पड़ सका सेहत पर भी वन के।
पर यदि सिंह दहाड़ छोड़ क्रन्दन पर उतरे,
निश्चय ही वन पर संकट के बादल घहरें।
तभी वन्य जीवों के मन में उठती शंका,
कि वन छोड़े शीघ्र या गहें पथ गहवर का।।
29.09.1994
(‘जवाहर नर्सिंग होम’ लूकरगंज इलाहाबाद में
पत्नी के इलाज के दौरान लिखित गीत - ज०प्र० ‘सात्विक’)
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