शुक्रवार, 12 मार्च 2021

कविता की अमराई : भाग - 2

15. अहं का दैत्य

आज अहम् का दैत्य
हमारे दरवाजे पर सींग मारता,
युग-युग से सँवरे आँगन में
मल-मूत्रों का कीच झारता।

दूर भगाकर इस दानव को
सुख का स्वप्न सजा सकते हो,
एवं संस्कृति के विकास में
आगे कदम बढ़ा सकते हो।।
30.08.1976


16. सेवा-निवृत्ति

पहले बन्धन, अब विहार है।

एक छटपटाहट पिंजरे की
इक आहट भविष्य खतरे की
संघर्षों से इन्हें जोड़ता

मेरा यह मन निर्विकार है।

कई आँधियाँ आकर गुजरीं
जन्म-मृत्यु से राहें गुजरीं
सकल जगत् ही है कुटुम्ब-सा

मन! चिन्ता का क्यों शिकार है ?

अब न समय का बन्धन सहना
मुक्त हवा-पानी-सा बहना
जीवन-सरिता के प्रवाह में

सुख-दुःख का अब नहीं भार है।
पहले बन्धन, अब विहार है।।


17. हाइकू-गीत

बच्चे का मुँह
एक प्रयोगशाला
वस्तु-ज्ञान की।

मिट्टी का चूरा
या जो भी लगे हाथ
मुँह में डाले।

चींटी या चींटा
जो पकड़ में आये
मुँह-हवाले।

बच्चे की जिह्वा
एक साधना स्थली
तथ्य-ज्ञान की। बच्चे का मुँह.......

माँ को जो देखे
तो किलकारियों से
स्वागत करे।

गूँगे के गुड़-सा
भावों का निर्झर
नयनों झरे।

वाह! क्या बच्चा
है, मन का सच्चा वो
वस्तु-ध्यान की। बच्चे का मुँह......
(‘मरु-गुलशन’07.09.1999)


18. औ’ पुलिस सोयी हुई

शहर में तो मचा कत्लेआम
औ’ पुलिस सोयी हुई।
उन पे देखो खून का इल्ज़ाम
औ’ पुलिस सोई हुई।

घूमते यमदूत आठो याम,
पुलिस है सोयी हुई
या कि कैसा घूस का यह काम
कि पुलिस है सोयी हुई।


19. धूप (मुक्तक)

इन ठिठुरती सर्दियों में
हम जरा-सी धूप ले लें,
कालिमा के इन दिनों में
हम कुमुद का रूप ले लें।

धूप तो गायब हुई है
गदर्भों की सींग जैसी,
शीत से जग को बचाने
सूर्य का हम रूप ले लें।

माघ-पूस के घोर शीत में
बड़ी सुहावन लगती धूप,
अंग-अंग जब जकड़ गया तो
अकड़ छुड़ाने लगती धूप।

बड़े सवेरे झुण्ड बाँध कर
टेलीफोन के तारों पर,
कौओं की पंचायत बैठी
कड़क ठण्ड में लेने धूप।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें